घने केशुवों की ये काली घटा
बेचैन मौसम हो जाया करती है
बिछी हैं जुल्फें काँधे पर इस तरह
जैसे धूप की छाया तुम पर मरती है
ऊपर से नीचे आती भौहें
माथे पे सँवर जाया करती है
सुंदर कोमल कान तुम्हारे
पवन जिसे गीत सुनाया करती है
वो प्यारी लाल छोटी सी बिंदी
ग्रहण को भी नजर लगाया करती है
आँखें गहरी सागर सी
नदी जिसमे डूब जाया करती है
कजरारे नैनों की ये माया
काजल शर्म से छुप जाया करती है
दो पंखुड़ियाँ खिली हों गुलाब के जैसे
होंठों की हँसी रंग जमाया करती है
वो छोटा सा काला तिल
तुम्हारी मुस्कान पर बिखर जाया करती है
शहद सा मीठा बदन तुम्हारा
जैसे नशे में मधु झूम जाया करती है
जितना कहो उतना कम लगता है
तुम्हारी हर अदा मुझे तड़पाया करती है।
🌹🌹🌹
©vikasgarg
V