तुम्हारी बात क्या करें
समय भी कम पड जाता है
दिन और रात में कोई
फर्क सा नहीं रह जाता है
तेरे रूखसार की लाली
तेरे गेसुओं की घटा काली
नजर का कातिलाना अंदाज
बदन में बिजली का परवाज
अदा में एक कशिश सी है
जुबां में गम न रंजिश है
गुमां है मुझको तुझ पर
यकीं हर बात का हो जाता है
तुम्हारी बात क्या करें
समय भी कम पड जाता है...
मेरे दिलो दिमाग में तू
मेरी श्वांसों की लय में तू
मेरी धडकन, मेरी कण कण
सब में रची बसी है तू
तेरे बिन जिंदगी की कल्पना
ये दिल कर न पाता है
तुम्हारी बात क्या करें
समय भी कम पड जाता है....
©newera
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