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तुम्हारी बज्म से उठकर जानिब जाए कहाँ हम ।

तुम्हारी बज्म से उठकर जानिब जाए कहाँ हम
दिल की धड़कन तुम्हीं हो जाए तो जाए कहाँ हम।
तेरे दर पे आया हूं खुद का ही फातेहा पढ़ने
जगह मौत की है मुकर्रर अब जाए कहाँ हम।
तेरे ही गोद में इस रिंद को गहरी नींद आएगी
रखा है सर उम्र भर तो इस वक्त जाए कहाँ हम।
इस बदन में लरजिश है सांसों में गर्दिश है
एहसास-ए-गर्मी को आग जलाए कहाँ हम।
हां तेरे ख्वाब है अपने तेरे जज्बात है अपने
मेरे गम को भी पनाह दे दो इसे ले जाए कहाँ हम।
बे-साख्ता अनुराग आया है तेरी कफस के सफीलों में
मक़्तल ये जो निगाह है तेरी मरने जाए कहाँ हम।
©anuragrahi