खुश्बू से लवरेज आवरण
महकाता मेरा तन मन
सौष्ठव कंचन तेरी काया
हृदय प्रसून मन को भाया
आँखें हैं या झील कमल
गेसू हैं या काली घटा प्रबल
होंठ हैं या गुलाब पंखुरी
गाल है या संदली मलमली
कमर लचकती अदा लुभाती
कुच तेरा यौवन भार उठाती
भटक जाता हूं तेरे भूगोल में
कटि कुच के रंगीन माहौल में
©abhidilse
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