तुम्हें पता है कौन हो तुम मेरे जिंदगी की अनछुई परछाई हो तुम समझता मैं भी अजनबी था तुझे, मिला मुझे खुद का पता जब न था, मिली जब पनाह तेरे प्यार की, छोड़ हक़ीक़त सपनों में खो गया, मिला तेरा साथ तो अपनों का हो गया, बिताये हर एक पल ग़मों से दूर रहा मैं, रहता जिस गुरुर में था मैं, उससे दूर रहा मैं, मुझे नहीं पता क्या सीखा तुमने मुझसे, मगर इस दिल ने सीखा बहुत तुझसे, सपनों की हक़ीक़त, हक़ीक़त का टूटना, ज़िन्दगी की सच्चाई, और दिल का रूठना, अब इससे ज़्यादा क्या बताये ये दिल ,तुम कौन हो।
©ranjan
R