तू बनी हो बागवान तो उस गुलशन से गुजर जाना
भौंरे हैं कुछ ज्यादा वहां भौंरो से संभल जाना।
मुझ गुलशन ए हस्ती में कम खिलते हैं गुल ऐसे
ये दुनिया महक उठेगी मेरे दिल को तुम मसल जाना।
मैं हूँ मस्ती भरी महक गुलजार ए मुहब्बत में
मदहोशी ए आलम है चेहरे का बदल जाना।
मस्ती के बेहोशी से आंख का ये कहना है
आदमी की नियत हूँ मुमकिन है बदल जाना।
इन घनघोर घटाओं में थरथरी फिजाओं में
ऐसे सनसनी हवाओं से मुश्किल है संभल जाना।
ऐसे इन्कलाबी मौसम में लाजमी है अनुराग के तेवर भी
उठना फिर शांत होना शांत होकर भी बहक जाना।
©anuragrahi
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