तू जो पास आए कुछ तो शरारत कर लूं
थकी बदन की अपनी ख़त्म हरारत कर लूं।
मर्हम-ए-जख्म सा है मेरे लिए मिलना आपका
हूं ग़ुलाम हुजूर कुछ दिन और वजारत कर लूं।
धड़कने रूख सी गई आंखें झुक सी गई है
आयी हो रूक भी जाओ कुछ दिन इशरत कर लूं।
इशरत-ए-कतरा बन के आयी हो जिंदगी में फिर
तेरे इस मौजुदगी में हासिल इश्क की महारत कर लूं।
ख़ुदा ने मेरे हिस्से में मुहब्बत बख्शा ही नहीं
आज़ तेरे दिल से अपने दिल का तिजारत कर लूं।
मिल्लत-ए-हुस्न का न निकला अब तक मायने कोई
खातिर रजालत के अनुराग जिस्म से रुह की हिजारत कर लूं।
©anuragrahi
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