भीतर में अपने एक बांध बनाना.....
मन की उलझनों से थोड़ा ऊपर उठाना.....
उसमें अपनी द्रढता के लंबे तार लगाना.....
अपनी मेहनत की किलो को हर कदम पर गड़ाना....
हाथों के सहारे की दोनों और रस्सी सजाना....
छोर की मजबूती को स्वयं से अवगत कराना....
और धीरे-धीरे कदम बढ़ा कर उलझनों को पार कर जाना.....
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