उम्मीद की एक हल्की सी लौ थी दरमियाँ
आहिस्ता आहिस्ता बुझती जा रही है......
राह देखती अंखिया अब शायद
अपनी पलकें झुका रही है.....
दूर तलक साथ चलने की ख्वाहिसे...
अब धुंदली सी होती जा रही है.....
उम्मीद की एक हल्की सी लौ थी जो दरमियाँ
आहिस्ता आहिस्ता बुझती जा रही है.........
©ankita_28
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