उनके आंखों में थी एक गहरी नमीं
फिर किस बात का गुमां रह गया ।
छोड़ कर आए थे गिले-शिकवे मगर
जाने क्या क्या फिर दरम्यां रह गया ।
सोंचता हूं कि जब मैं फिर उनसे मिलूँ
पुछूं वो दिन कहाँ और दिल जवां रह गया ।
आज का ही नहीं है सदियों का ये वास्ता
गए छोड़ कर मगर दिल में इक निशां रह गया।
गर्दिश के आंधियों का इरादा कुछ अच्छा न था
बुझते बुझते इक जलता शमां रह गया।
हम तो अपने ग़ज़ल के लिए इतने मोहताज है
हरफ लिखते गए पर बंद जुबां रह गया।
©anuragrahi
S