ख्वाहिशों की बहती नदी में आलोचना का प्रवाह है
मुझे,इक कच्ची उम्र के नाविक को इसमें बहने की चाह है
न तो कोई पतवार है न ही किसी तिनके का सहारा है
छोटी हैं बाजुएँ फिर भी आँखों में उस पार ही का नजारा है
रुकावटों का बहाव भी वहीं तेज है जहाँ नदी का किनारा है
मैने भी तो अपने हौसलों को बीच धार में उतारा है
डूब जाने का खतरा हर तरफ फैला हुआ है
इरादों ने तो भी गौरव पकड़ रखा उम्मीदों का गुब्बारा है
गौरव राव
22/09/2019
©gauravrao
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