उस चाँद को देखो ना
देखो ना जाना
उस चाँद को देखो ना,
कितना खुश है अपनी चाँदनी के साथ।
चमकता हुआ उसकी रोशनी से,
निखरता हुआ उसके इश्क़ से,
इठलाता हुआ सारे आकाश में।
इतने तारों के बीच अकेला होकर भी पूरा है,
क्योंकि वो अपनी मोहब्बत के साथ है,
अपनी चाँदनी के साथ है।
पर इश्क़ की राहें शायद हमेशा आसान नहीं होतीं।
एक दिन उसे भी दूर होना होगा
अपनी मोहब्बत से।
रहना होगा अँधेरों में—
अकेला… थोड़ा उदास,
इतने तारों के बीच
इंतज़ार करते हुए अपनी चाँदनी का।
फिर आती है वो घनेरी अमावस की रात,
जो छीन लेती है उससे
उसकी मोहब्बत का साथ।
दूर हो जाते हैं दोनों,
पर कहानी वहीं खत्म नहीं होती।
वो फिर उसी आसमान में
एक लंबा सफ़र तय करते हैं—
मिलने को एक-दूजे से।
शायद इश्क़ का सच भी यही है…
चाँद भी मुकम्मल नहीं इश्क़ में,
वो भी तड़पता है
अपनी मोहब्बत से मिलने को।
वो भी तरसता है
उस साथ के लिए
जिसमें उसकी रोशनी बसती है।
तो फिर अपना क्या कहूँ…
क्या वास्तव में यही इश्क़ की नियति है—
मिलना और फिर बिछड़ जाना?
हँसना… और फिर चुपचाप रो लेना?
क्या सच में इश्क़ यही है—
दूरी में भी उसी का इंतज़ार करना?
क्या अधूरा होना ही इश्क़ है…
बताओ ना, जाना।
-शिवन्या
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