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उस शाम, जब तू सामने था शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। हवा में हल्की ठंड घुल चुकी थी…

उस शाम, जब तू सामने था
शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। हवा में हल्की ठंड घुल चुकी थी, और दुनिया अपने शोर से थककर जैसे शांत होने लगी थी। उसी खामोशी में अचानक मन हुआ — काश अभी तेरे पास पहुँच जाऊँ।

मैं चुपचाप तेरे पीछे आकर खड़ी हो गई ।
तू शायद अपने ही खयालों में खोया था।
मैंने धीरे से हाथ बढ़ाकर तुझे छुआ… बस हल्का सा।
और तेरे नाम को इतनी धीमी आवाज़ में पुकारा, जैसे कोई राज़ हवा को सौंप रहा हो।

तू पलटा।

और उस पल सच में वक़्त रुक गया।

तेरी आँखें मुझ पर ठहर गईं। होंठ हिले, मगर शब्द बाहर न आ सके। जैसे दिल ने बोलना चाहा हो, पर आवाज़ रास्ता भूल गई हो। तू बस देखता रहा — अपलक, शांत, हैरान… और जाने क्यों, बेहद खुश।

कुछ पल बाद जैसे तुझे होश आया।
तू अचानक मेरी ओर बढ़ा और मुझे अपनी बाहों में भर लिया।
इतना करीब… जैसे लंबे इंतज़ार का अंत आखिर मिल गया हो।

तेरी पकड़ बार-बार कसती जाती थी,
जैसे यकीन करना चाहता हो कि मैं सच में यहीं हूँ।

फिर तूने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया।
तेरी उँगलियों की गर्माहट गालों पर ठहर गई।
तू कभी मेरे माथे को चूमता, कभी आँखों के पास ठहर जाता…
और हर बार तेरी साँसें थोड़ी और गहरी हो जातीं।

उस पल में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी —
बस एहसास था, जो धीरे-धीरे फैल रहा था।

हम आग की छोटी सी लौ के सामने बैठ गए।
लपटें हल्के-हल्के हिल रही थीं, और उनकी रोशनी तेरी आँखों में चमक रही थी।
तू बिना कुछ बोले मेरे हाथ अपने हाथों में लिए बैठा रहा,
कभी उन्हें सहलाता, कभी चुपके से चूम लेता।

मैंने देखा — तेरी आँखों में नमी थी।
खुशी की, राहत की… शायद मेरे होने की।

रात गहरी होने लगी।
ठंडी हवा चली तो तूने बिना कुछ कहे अपनी गरम कमीज़ मेरे चारों ओर लपेट दी।
मैं तेरे और करीब आ गया — और उस गर्माहट में अजीब सा सुकून था।

हम दोनों नदी किनारे जाकर लेट गए।
नीचे नरम रेत हमारा बिछोना थी , ऊपर आसमान हमारा कम्बल ।
हाथों में हाथ थामे हम सितारों को गिनने लगे…
लेकिन कुछ ही देर मे एक-दूसरे की साँसों पर अटक गए ।

तेरा हाथ मेरे सिर के नीचे था,
और मैं तेरी धड़कनों की लय सुन सकता था।
धीरे-धीरे हमारी साँसें एक ही रफ्तार पकड़ने लगीं।

खामोशी अब खाली नहीं थी —
वो हमारे बीच भरी हुई थी।

तू थोड़ा और करीब आया…
इतना कि दूरी नाम की कोई चीज़ बाकी न रही।

और उस रात,
न नदी बहने की आवाज़ अलग थी,
न हवा की ठंड महसूस होती थी।

बस दो लोग थे —
जो शब्दों से आगे बढ़कर
एक ही एहसास में बदलते जा रहे थे।

और शायद पहली बार,
प्यार कहा नहीं गया…
बस पूरी तरह महसूस किया गया।

✍️शिवन्या