सेवा में निश्चलता का समावेश है
इसके भीतर शुद्धता के अवशेष है
सेवा ही व्यक्तित्व में विशेष है
सेवा से ही से ईश्वर में प्रवेश है
सानिध्य मिले ईश्वर का,
ऐसा ही इसमें भावेश है
ईर्ष्या क्रोध लोभ को मिटाना ही
सेवा का आवेश है
नम्रता ही सेवाभावी के हृदय का अभिषेक है
जो सेवा में स्थापित हो वह ईश्वर का ही भेष है
नमन है इस भाव को ,
इसे धारण करने की इच्छा ही भीतर में शेष है
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