वे मेरे हम शक्ल है वे मेरे हम साया हैं
दिलनशीं दिलबर मेरे मिलने मुझे आया हैं।
चांद की परछाईं जैसे चांदनी कहलाती है
मेरे महबूब भी मुझमे वैसे समाया हैं
दिल की नगरी में अब मेरा दिल विरां नहीं
मखदूम हैं मेरे अक्सर दिल में मुझे बसाया हैं।
शाम सजदे में गुजरेगी और रात रंगिं होगी
हमनशीं वर्षो बाद घर मेरे तकलुफ लाया हैं।
तुम सजर हो वैसे ही खड़े रहो मेरे आंगन में
जालिम जुल्म अब तक बहुत बरपाया है ।
नौहा अब न पड़ेगी कभी इस आंचल में
अनुराग यूंही अब तक बहुत मुझे रूलाया है ।
©anuragrahi
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