मुझको बहुत वहम था
परिवार में मैं हीं तो अहम था
मेरे बिना न मेरा कारोबार चलेगा
मेरे बिना न मेरा प्यार जिंदा रहेगा
मेरे बिना मेरा घर संसार नही चलेगा
धक्का लगा बडे जोर का
दिल में मचा एक शोर सा
बच्चों ने संभाला था कारोबार
बीबी देख रही थी घर संसार
मैं किसी शानदार फ्रेम में जडा था
सामने सब कुछ लय में खडा था
जिसको समझता रहा मासूम व नादान
चला रहा था बेहतर हमसे भी दुकान
साल में बस एक बार आंखों में नमी थी
शायद उस दिन उनको मेरी खलती कमी थी
बेवजह का पालना न कभी वहम
तुम्हीं तुम हो और कोई नही अहम
जो भी उत्तराधिकार में है झेल लेगा
जिंदगी के अपने हिस्से को खेल लेगा
हम महान भर कहलाएंगे कहानियों में
तस्वीर जैसी लटकती घर की निशानियों में
...........अभय.....सुप्रभात
©abhidilse
A