ऊपर से अंधाधुंध बढ़ती गर्मी, पिघला रही है हमारी जमा पूंजी
बचा लो उस बर्फ को, जो जीवन की है अंतिम कुंजी
हर रोज टपक टपक कर सैंकड़ो लीटर पानी सागर मे मिल जाता है
समझो मनुष्य के जीवन छप्पर का रोज एक स्तम्भ हिल जाता है
एक दिन नही दिखेगी ऐसी जैसी हंसती खेलती आज की शक्ल है
जल है तो कल है
बरसता पानी देखो जरा ध्यान लगाकर, ये तो है रब का साक्षात रूप
यही है असली अमृत वर्षा बाकी सब कुछ जिस्म झुलसाती धूप
कर लो जमा कही इस अकूत बरसते भंडार को
इक्ट्ठी करके बुंदो की दौलत, रोको कुछ और साल हाहाकार को
वरना फिर से हर तरफ हो जाने वही जंगल है
जल है तो कल है
जल है तो कल है
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©vicky31
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