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विश्वास नहीं

क्यूं होता है विश्वास नहीं
क्या तुम मेरी आस नही?
जग ने जो भी प्रसाद दिया
तुमने जो भी संवाद किया
सिलसिला चलाकर तुमने
मुझसे विश्वासघात किया
फिर भी तेरे पीछे पीछे
यूं चलता रहा अंखियां मीचे
क्या मेरे सपनों का तुम रास नहीं?
क्यूं होता है विश्वास नही?
साथ दिया फिर छोड दिया
कभी हाथ मिला कभी मुंह मोड लिया
कितने चंचल घातों को सह
तेरे संग रहना स्वीकार किया
पल पल बदलती तेरी अदा
गंभीर विषय, कोई परिहास नहीं
क्यूं होता है विश्वास नहीं?
कैसे सपने साकार करूं
नयनों में रख श्रृंगार करूं
दुख को भोगूं, सुख की सोंचूं
पल पल दिल को क्या क्या समझूं
तुम प्राण मेरी हो मेरी प्रिय
मुझसे मिलन का क्यूं प्रयास नहीं?
क्यूं होता है विश्वास नहीं?
©abykv