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वक्त के साथ।

मुनासिब है कि आज मैं घर पर ही रहुं,
शहर में बड़ी दहशत है खुद को क़ातिल निगाहों से बचा के रहुं।
अनुराधा राधा सब वहाँ मिलेगी खुल न जाए छीपी राज,
दोनों से मुझे मुहब्बत है ऐसे ही मुहब्बत बना के रखू।
गमजदों के लिए है मयखाने जो गम में डूबे रहते हैं,
मेरी खुशी में तो नमी है ये नमी मैं बचा के रखू।
शहर गाँव मुहल्ला चारो तरफ उसी की चलती है,
सिर्फ अभी वक्त मेरा है मैं वक्त बचा के रखू।
निजाम बहुत है उसपर उसके चार-सू में,
मगर मैं हूं पुराना खुद का निजामियत दिखा के रखू।
महफिलों में और भी बढ जाती है उसकी रौनकें,
हो जाएंगे सब पागल वगरना नकाब पहनाकर के रखू।
उम्र में बड़ा हुं जरूर मगर हुं उसका सागिर्द, सलिखा उसी से सीखा है वह हुनर बचा के रखू।
करवटे लेंगी हया खिलाफ मेरे जीवन में जरूर,
जैसे तैसे जो मिलता हूँ कम से कम इज्ज़त बचा के रखू।
©anuragrahi