V

वो बचपन

वो बचपन भी कितना सुहाना था, 
हर रोज जिसका एक नया फसाना था ।
कभी पापा के कंधो का, 
तो कभी मां के आँचल का सहारा था। 
कभी बेफिक्रे मिट्टी के खेल का, 
तो कभी दोस्तो का साथ मस्ताना था ।
कभी नंगे पाँव वो दोड का, 
तो कभी पतंग ना पकड़ पाने का पछतावा था ।
कभी बिन आँसू रोने का,
तो कभी बात मनवाने का बहाना था
सच कहूँ तो वो दिन ही हसीन थे, 
ना कुछ छिपाना और दिल मे जो आए बताना था ।
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©vicky