टुटता रहा ,
बिखरता रहा ,
मिट्टी का था ,
मिट्टी में ,
मिलता रहा ,
मूर्ख था ,
स्वार्थी नहीं ,
कभी मौसमों की मार ,
कभी तुफानों के ,
थपेड़ो से ,
कांपता रहा ,
जुझता रहा ,
मगर सहता रहा ,
घुट घुट पीड़ा ,
पीता रहा ,
तिल तिल कर ,
जलता रहा ,
दूसरों के ,
वजूद के लिए ,
अपना वजूद ,
खोता रहा ,
वो दीपक ही था ,
जो अपनी बाती ,
जलाकर भी ,
अंधेरों से द्वंद ,
करता रहा ,
रह कर ,
अंधेरे में भी ,
दूसरों के लिए ,
उजाले को ,
अंकुरित करता रहा ,
अवसाद था ,
उपेक्षा भी था ,
पर अपेक्षा की ,
दरकार नहीं ,
जानता था ,
मिट्टी से बना हूँ ,
मिट्टी ही ,
मेरा ठिकाना है ,
तभी तो जलता रहा ,
जलता रहा ,
खो कर ,
वजूद को भी ,
अपने वजूद में ,
मिलता रहा ,
वो दीपक ही था ,
जलता रहा ,
कभी किसी के ,
आने के खुशी में ,
कभी किसी के ,
जानें के ग़म में ,
पर हरदम ,
दुसरे के नाम पर ,
जलता रहा ,
वो दीपक ही था ,
दीपोंभव होकर ,
जलता रहा ।🤔
धन्यवाद 🙏
_______संजय निराला ✍
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