S

वो दिल नहीं था इक पत्थर जिसने ये सिला ली है ।

वो दिल नहीं था इक पत्थर,जिसने ये सिला ली है
हमने जुर्म तो नहीं किया,मुहब्बत ही फकत की है।
मंजीरे-दर से बंधी थी,हर तरफ सभी मेरी ये आहें
मकसूद जो दबी थी,तूने उस दिल को हवा दी है।
मेरे तरफ भी कोई,अहसाने वफा जरा कर दो
शिकवा न कोई शिकायत,उलफत की हिमाकत की है।
मेरे ख्याल से मुझको,तूझसे गुफ्तगू की सिफारिश हो
शाखे गुल दिखा है,जो तूने वर्षो छुपा रखी है।
महताब में लगा धब्बा,फितरत के करिश्मे है
वादे वफा हो मुकर्रर,ये खुदा की भी मर्जी है।
हटे आंखों से तारिक,हो बसर अनवर-ए-इलाही की
हर बुत पे जाकर ये दिल,तहेदिल से दुआ की है।
©anuragrahi