V

वो हसीना

वो मृगनयनी शोख हसीना।
मोहक रंगों वाली है।
हिरनी सी है चाल अनोखी।
चंचल चितवन वाली है।
कजरारे नयनों में वो काजल
खूब लगाती है।
होंठों पर मुस्कान सजा के 
सबका होश उड़ाती है।
कोमल कोपल पंखुरी लागे।
रंग गुलाबी भाता।
जब चलती है लगे समीरा
सावन उमड़ के आता।
झर झर के वो झरना नाचे
जिसमे सिमट वो जाती।
यौवन की वो देहक अनिलः
मेरे होश उड़ाती।
रात ढले वो छत पर आये।
चाँद देख उसको शरमाये।
उड़ती जुल्फे महका आँचल।
उसको खूब सजाते हैं।
दीवाने इस मेरे दिल की आँखों
से नींद चुराते हैं।
आँखों से नींद चुराते हैं।
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©vikasgarg