वो जिंदगी जोड़ कर जी मैं जमीर बेच कर जीया
बस यही मलाल रहा कभी खुशी नसीब होने न दिया ।
न हुआ कभी अंदाज उसके उम्मीद जो थे मुझसे
अजियत सह सह कर भी साथ हर मोड़ पर दिया।
मेरे मुस्कुराहटों के एवज में बढ जाती मेरी खुशामदगी
ऐसे अदा की है वो उनका मैंने कर्ज अदा नहीं किया।
किस लिए आते हैं ऐसे लोग इस जहन्नुम में
यादें उनकी कभी रूला भी दिया कभी हंसा भी दिया ।
खुद से गिला के सिवा बचा क्या उनके एहतराम में
हमनें इस तरह सजा भी दिया खुद को घटा भी लिया।
आज इस दहलीज का सफर अनुराग खुद का करम है
तेरे आंखों ने आंसू बहा भी लिया सुखा भी लिया।
©anuragrahi
S