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वो कैसे पहचान पाएगा,मुझे जो देखता कम है।

वो कैसे पहचान पाएगा,मुझे जो देखता कम है
रहता है मेरे पास ही मगर मिलता कम है।
घर के दरिंचों को लगा है बंद रखने अक्सर
बात करता है दिवारों से बाम पे निकलता कम है।
मुझे उसके रूख-ए-मिजाज का कोई ऐतवार नहीं
वो बोलता बहुत है मगर करता कम है।
बागबां तेरे बदन से खुशबू क्यों नहीं आ रही
गुलिस्तां में आज क्या गुल खिले कम है।
हम हसरत-ए-बरकत में अपना धंधा बदलते हैं
मगर खर्च जियादा है मुनाफा कम है।
मेरी जां मैं तेरे लिए अपनी जां तक दे देता मगर
इस गरिब अनुराग के जान का मुआवजा कम है।
©anuragrahi