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वो लम्हा

ज़िन्दगी को परत दर परत खोला
बीते सालों को, महीनों को टटोला,
उन्हें अच्छे से निचोड़ कर लम्हों के क़तरे निकाले
ऐसे कई छोटे-मोटे लम्हे फ़र्श पर उड़ेल डाले,
टकटकी लगाये, हर एक लम्हे पर नज़र गड़ाए
हर एक को उलटता रहा, पलटता रहा
कुछ लम्हे हसीन थे, कुछ लम्हे ग़मगीन थे,
कुछ धुंधले भी थे, कुछ अधूरे भी थे
कुछ में मैं अकेला था, कुछ में हम सभी थे,
कुछ तो ऐसे भी थे जो अजनबी थे,
कई घंटों तक उन्हें देखता रहा, सोचता रहा
इन लम्हों को भी जी लेता तो क्या हो जाता,
एक ऐसे ही अजनबी लम्हे को उठा कर
एक मासूम सा सवाल किया मैंने,
“तुम कब आये मेरी ज़िन्दगी में
मैंने तो तुम्हें कभी देखा नहीं,
क्या तुम सपनों के वो लम्हे हो
जिसे मैं सिर्फ़ ख़्वाबों में जीता था,
जब भी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी के बाद मैं सोता था”
उस नन्हे से लम्हे ने कहा,
“वो तो मेरी ज़िन्दगी का ही हिस्सा है
‘ख़्वाबों के लम्हे’ ये तो बस एक किस्सा है
याद करो वो यारों की महफ़िल
खुला आसमान, घर की ऊपरी मंज़िल
समा जवां हो ही रहा था कि तुम उठ गए
तुम्हारे इस बेगानेपन से सब रूठ गए,
तुम्हें किताबों के दो-चार पन्नों को पांचवी बार जो पढ़ना था
आज की क़ुरबानी दे कर तुम्हें कल से जो लड़ना था”
कई देर तक उसे देखता रहा, उसकी बातों को सोचता रहा
क्या हो जाता गर दीवारों पर दो-चार तमगे कम लटकते
क्या हो जाता गर बाबूजी का सीना दो इंच कम फूलता
यारों के साथ दो गीत गुनगुना लेता तो क्या हो जाता
इस लम्हे को भी जी लेता तो क्या हो जाता,
उस अजनबी लम्हे से खुद को निकाला
एक मायूस लम्हे को उठा कर गोद में संभाला,
वो उदास था, बहुत उदास था
उसे ध्यान से देख कर याद किया
कि आखिर ऐसा क्या हुआ जब ये लम्हा मेरे पास था,
ओहो! किसी अपने ने मुझे कुछ कहा था, जो अभी याद नहीं
पर हाँ उस वक़्त मुझे वो बात बहुत बुरी लगी थी
उसने मुझे समझाने की नाकामयाब कोशिश भी की थी
पर हाँ उस वक़्त नाराज़ रहने की धुन सर पे चढ़ी थी
मगर आज न उसे कुछ याद होगा, न मुझे वो बातें याद हैं
याद करें भी तो बस वो रूठे लम्हे और वो ग़मगीन रातें याद हैं
कई देर तक उस रूठे लम्हे को देखता रहा, सोचता रहा
क्या हो जाता गर उसकी बात को दिल पे न लेता
क्या हो जाता गर उसके समझाने पर पर मैं मान लेता,
न मैं उदास होता, न वो लम्हा मायूस होता
इस लम्हे को भी जी लेता तो क्या हो जाता,
याद रखूँगा इन लम्हों की बात को
“ज़िन्दगी तो कर कोई जिया करते हैं
ज़रा हर लम्हों को जी कर देखो” …
कोशिश करूँगा, ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव पर,
ऐसे ही किसी खुद से बातें करते वक़्त मैं न कहूँ
दो पल जीने के और मिल जाते तो क्या हो जाता,
मैं वो लम्हा जी लेता तो क्या हो जाता
मैं ये लम्हा जी लेता तो क्या हो जाता|
©ranjan