वो आहिस्ता आहिस्ता से मुझमें समा रही है ।
एक प्यासी सी चिड़िया धूप में जैसे चहचहा रही है,
रंगों से घिरी एक तितली भी बेरंग हवा से टकरा रही है,
ठीक उसी तरह जैसे वो आहिस्ता आहिस्ता से मुझमें समा रही है ।
बूँदे मिट्टी को जैसे भीने भीने से फुसला रही है ,
तुम्हारे आंचल को हवाये भला ऐसे क्यों लहरा रही है ।
नम हवाओ में अटकी वो मिट्टी की खुशबू ,
जो मुझे भी मिट्टी में मिलने बुला रही है
हां वो आहिस्ता आहिस्ता से मुझमें समा रही है ।
इत्र की खुशबू से मन ये बहकता है ,
गुलाबो के फूलो पर पंक्षी सा चहकता है ,
फिर,क्यों इत्र में घुलकर गुलाब की कालिया
गलीचा हमारा मेहका रही है ,
हां ऐसे ही वो आहिस्ता आहिस्ता से मुझमें समा रही है।
तुझे छूती जो हवा उससे क्यों बैर सा होता है ,
हां पुरानी है बातें सारी खैर इससे क्या होता है ,
ना जाने क्या हुआ है इन बैरी हवाओ को ,
कोई पुराना राब्ता मुझसे दिखा रही है ,
जैसे वो आहिस्ता आहिस्ता से मुझमें समा रही है ।
पंखो से मैंने हवाओ को काटा है ,
हां मैंने भी प्यार अपना किसी से बाटा है ,
फिर क्यों पिंजरे की दीवारे मुझे अंदर बुला रही है ,
जो हो ना सका हो कर भी मेरा ,
वो क्यों आहिस्ता आहिस्ता से मुझमें समा रही है ।
# aryanaag
©aryangupta
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