मैं एक वृक्ष था एक बीज से जन्मा था,
एक सज्जन ने एक बीज दबा दिया था,
वो रोज पानी पिलाता रोज खाद खिलाता,
मुझको पोषक तत्व खिलाता,
पर जमीं के अंदर मेरा जीवन तन्हा था,
मैं एक वृक्ष था एक बीज से जन्मा था,
सोचा 1 दिन इस तन्हाई को तोड़ डालू,
बाहर जाकर प्रभु संसार के दर्शन कर डालू,
मैंने अपना कवच तोड़कर मिट्टी से बाहर निकलना था,
मैं एक वृक्ष का एक बीज से जन्मा था,
एक दिन मैंने अपना कवच तोड़ मिट्टी से सिर बाहर निकाला,
बाहर देखा तो हर तरफ फैला था उजाला,
मुझे लगा मेरे जीवन का सवेरा हो गया,
मैं धीरे-धीरे पल्लव से पौधा हो गया,
मेरे जीवन में इतनी खुशी सी छा गई थी,
जीवन जीने की एक नई तरंगें पैदा हो गई थी,
धरती के गर्भ से अमृत जल पीने लगा था,
मेरे पर कुदरत का रंग छाने लगा था,
समय बितने पर बच्चे से अब जवान हो गया,
मुझे लगा मैं भी प्रकृति की इक शान हो गया,
ना तो मैं अकेला था ना ही मैं तन्हा था,
मैं एक वृक्ष का एक बीज से में जन्मा था,
अब मेरी शाखाओं पर नए पत्ते आने लगे थे,
जीवन के नए सौरभ खिल खिलाने लगे थे,
कड़ी धूप से सहकर लोगों को छाया देता था,
प्राणवायु देकर प्रदूषण खींच लेता था,
थोड़ी हवा चलने पर मैं भी झूमने लगता था,
धरा से पानी खींचकर हर एक पत्ते को देता था,
देखकर इस काम को विज्ञान ने अनुसंधान किया,
और इस काम को "केशाकर्षण" का नाम दिया,
जे. सी. बोस ने सिद्ध किया मुझमें प्राण है,
मत मारो इसको, इसमें भी भगवान हैं,
मैं एक वृक्ष था 1 बीज से मै जन्मा था,
यहां पर कौन किसी की सुनता है,
प्राण दाता पर ही कुल्हाड़ी चलाता है,
कुल्हाड़ी से मुझ पर बार बार वार किया,
मुझ को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया,
एक बेटे को अपनी मां धरती से अलग कर दिया,
बेचने के लिए मुझको बाजार गया लाया,
इंसान ने मुझको देख लकड़ी का भाव बताया,
केवल लकड़ी समझ कर मुझको जगह-जगह से काटा गया,
मुझे फर्नीचर बनाकर घर में सजा दिया गया,
कुछ वर्षों बाद मुझ को आग में डाल दिया ,
ठंड से बचाने इंसान को मैंने खुद को जला दिया,
मुझे खुशी है कि मैं मर कर भी काम आया,
मुझे खुशी है कि मैंने धरतीपुत्र का फर्ज निभाया,
मैं एक पौधे से वृक्ष बन गया फर्नीचर बनकर मैंने घर की शोभा को बढ़ाया,
ठंड से बचने के लिए मुझको गया जलाया,
आज मैं राख बन गया हूं राख बनकर खेत में फैल जाऊंगा,
सारी दुनिया के लिए अन्न उगाऊंगा,
मैं एक वृक्ष था एक बीज से मैं जन्मा था
🌹विकास गर्ग🌹
©vicky
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