वर्षा रानी आई आज लाला को भिगोने।
और लालजी चले गए चद्दर तान सोने।।
सोते हुए लालजी को काटने लगे मच्छर।
समझ आ गया उनको वर्षा रानी का नेचर।।
सो उठ कर बैठे कुर्सी पर लेने लगे उबासी।
और प्राणवायु खींचने लगे बिल्कुल ताज़ी ताजी।।
ताजी ताजी प्राणवायु संग आया एक उत्तम विचार।
बोले प्रिय भाग्यवान बनने दो कुछ चटपटा मसालेदार।।
चटपटा मसालेदार सुनकर पत्नी का माथा ठनका।
पर नई पत्नी होवे देवी इतनी जल्दी ना हो सके सूर्पणखा।।
सूर्पणखा रूप छिपा बोली तो कीजिए आप मेरी मदद।
आखिर आप बने है मेरे जीवनसाथी, ताजीवन हमदर्द।।
हमदर्द कि बात सुन लालजी लगे कमर पकड़ कहराने।
आलसी इस कविता के कवि समान सो ढूंढ़न लागे बहाने।।
बहाने लगा बोले प्रियतमा मेरे अंग अंग में दर्द है।
जाड़े के इस मौसम है तुम्हारा प्यार कितना बेदर्द है।
किन्तु बेदर्द हाथों को ना बनाओ, बनाओ प्रिय पकोड़े।
तुम खा लेना थोड़ा ज्यादा, हम खा लेंगे थोड़े।
थोड़े ज्यादा की बात नहीं, बात है यह जिम्मेदारी की।
पकोड़े की इच्छा तो पत्नी के प्रति प्रेम व समझदारी की।
समझदारी देखो धरती से पानी सोखने के बाद ही वर्षा होती।
धरती से पानी ना जाता तो ना पकोड़ी की इच्छा, ना वर्षा होती।।
वर्षा हुई तो सीखो आप भी वर्षा और धरती का प्रेम नाता।
दिखाओ कैसे आज पति पत्नी को पकोड़े बनाके खिलाता।
सुनकर पत्नी के प्रेम वचन, पकोड़ी की इच्छा हुई समाप्त।
ठीक जैसे बादलों से पानी गिरकर, बंद हुई बरसात।।
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©vikasgarg
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