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वर्षों से दबी जज़्बात मगर अब नाजुक हालात हैं।

वर्षों से दबी जज़्बात मगर अब नाजुक हालात हैं
इजाजत हो गर हुजूर का तो कहना कुछ आपसे बात है।
तुम आती रही हो हर रोज़ और बस देखता रहा हूं मैं
न तुमने कहा न मैंने पुछा होती ये किसलिए मुलाक़ात है।
बस ख़्वाब में ही तुझको पाया मैंने अपने करिब
वगरना तू कहीं और मैं कहीं बस ये तारिक़ घनी रात है।
प्यार में बंदिश नहीं वस्ल पर ना ये धर्म का कभी ग़ुलाम
तुझे बता दूं मुझे मिलती हिंदू-मुस्लिम दोनों से दावत है।
ख्यालात के झुलो से उतरकर आज़ मैं कुछ तो करूंगा
साथ में मेरे तेरे होठों की तबस्सुम भेजा हुआ तेरा इक ख़त है।
मेरी रानी ग़ज़ल भर ही नहीं ग़ज़ल के जरिए ये कहता हूं
प्यार का पहला ख़त ठुकराना नहीं ये मेरी इज़हार-ए-मुहब्बत है।
©anuragrahi