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" वृष्टि "

बारिश में डूबा डूबा सा शहर ,
बरस रही है बूंद पहर दर पहर,
हरा रंग बिखेरे पौधों की जड़े ,भर रही है अपने गागर,
बह रही है नदिया बनने को सागर,
पंछियों ने ओढे है सिकुड़न की चादर,
प्रकृति का हर जगह खिलखिलाया है ,
इन बुंदो को पाकर ।।
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