बहती अपनी गतिविधियों को आज शब्दों में सजाते हैं
बाहरी क्रियाकलापों की दास्तां हम सुनाते हैं
और आंतरिक गहराइयों की सूक्ष्म व्याख्या बतलाते हैं
प्रातः से सूर्य संग हम भी चलते जाते हैं
प्रयासों की चोटी को हर रोज छू आते हैं
सुकून भरे चेहरे देख भाव में खो जाते हैं
कृतज्ञता की किरणों को समेटते हम जाते हैं
ईश्वर के अल्फाजों को अपनी वाणी में सजाते हैं
और संपर्कित हृदयो में आत्मीय बीज बो आते हैं
गहरे ज्ञान के समंदर में ना हम उनको डूबाते हैं
बस सरलता की नैया का चप्पू दे आते हैं
सूर्य के हर कोण पर हम भी घूम जाते हैं
ईश्वर के दिए जीवन का कर हर रोज चुकाते हैं
हृदय के गलियारे को खाली कर जाते हैं
थकती अपनी आंखों को धीरे से टिमटिमाते हैं
और सूर्य की ओट में रात्रि में सो जाते हैं
और ईश्वर के आंचल का अनुभव कर पाते हैं।।
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