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वतन के पास्बां

रन्जिश ए कौम तो बस एक बहाना है।
न मालूम यहाँ अपना कौन बेगाना है
कभी कहते थे बड़ी शान से गुलज़ार ए चमन
हालात देखकर तो लगता है
मुस्तक़्बिल इसका टूटना आैर बिखर जाना है
सरहद ए ज़मी को लहू से सींचने वालों
शमा तो है वतन ,,परवाने का काम तो जल जाना है
चाहते तो हम भी हैं बन जाए पास्बाए वतन
मुल्क की खूबसूरती तो बस तुम्हारी
वफादारी का नजराना है
©mannjaisy