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" व्यथा "

मन की अंधियारी चादर को ओढ़े,
निकला वो भीतर के एहसासों को छोड़ें,
कभी राग की रंजिश में फंसता
कभी द्वेष की माटी में धंसता,
छिछली सी रौनक के चेहरे को मोड़े,
असहाय की टोली में जाकर वह दौड़े,
कभी पूछो उससे क्या मिला तुझे वो ,
जो इन राहों से तुझे मोड़े
अपने ही शब्दों से जो अपनी रूह को तोड़े ,
और पछतावे की आंधी से बनते थे रोड़े
कभी पूछो उससे कि क्या कोई और तेरे शब्दों को आया था निकालने जो तू दौड़ाता है यहां पछतावे के घोड़े,
पूछो उससे क्या तू बैठा अपने साथ कभी ,
जो दिखलाता है ये रोने धोने ,
तेरे सवालों में तेरे जवाब के अंगार छिपे हैं
ढूंढले उनको जिससे पहले कि वह तुझे ही फोड़े
और तू अपना तन इस माटी में छोड़े !!
©myemotions