पैदा होने से पहले मौत लिख दी जाती है ,
गर जिंदगी मिल भी गई, तो आगे नर्क बन जाती है .,
बड़े नाज़ और प्यार से उसे घर लाया जाता है ,
घर में आने से उसके एक अलग सा अहसास होता है .,
पहले बच्चे की पहल से संसारी बरसते उस घर में ,
बेशुमार खुशियों का मेला लगता है .,
छोटी सी उमर में पापा का प्यार और दादी का दुलार ,
सारे सुखों से नवाजा जाता है.,
बड़ा होते-होते दुनिया की थोड़ी समझ ,
और परिवार पर भरोसा बन जाता है .,
साथ जिंदगी के, उमर बढ़ती जाती है ,
समाज में लड़कियों की जगह थोड़ी बहुत तब समझ आती है .,
वक़्त चलता जाता है ,
पापा का प्यार और सबका दुलार, गुस्से में बदलता जाता है .,
जहाँ पढाई के साथ दिन भर खेलने दिया जाता था ,
वहीं अब माँ का हर बात पर टोकना और घर से जादा निकलने पर रोकना शुरू होता है .,
देखते ही देखते किशोरावस्था का वो मंजर सामने आता है ,
दिल डंके की चोट पे और दिमाग उसे रोकने में लग जाता है .,
एक तरफ हम मानसिक बड़ी जंग लड़ते हैं ,
माँ की हमदर्दी और पापा से सहारे की उम्मीद रखते हैं .,
मगर जीतते-जीतते हम हार जाते हैं ,
जब सही होने के बावज़ूद गलत, अपने अपनो से ही कहलाते हैं .,
सहारे की बजाए बेसहारा और हमदर्दी की जगह ताने सुनाय जाते ,
हम समाज से नहीं डरते जनाब, हमें तो खुदके अपने ही गिरा जाते हैं .,
मजबूत तो हम भी काफी थे ,
मगर समाज के डर से छोड़ हमारे अपने ही जाते हैं .,
अरे पंख तो हमारे भी बड़े थे ,
मगर उड़ान पर बंदिशें तो खुदकी माँ ही लगा जातीं हैं .,
जहाँ गलत नहीं थे हम, झुकते नहीं ,
मगर भरोसा घर को, तो हमसे ज्यादा समाज पर होता है .,
लाख समझाने पर भी हमको गलत ही समझा जाता है ,
गलती लड़के की होने पर भी गलत हमको कहा जाता है .,
दुनिया का तो ठीक था मगर छूटा हाथ पिता का देख ,
टूट कर हम चूर हो जाते हैं .,
हमारे आने से जिस घर में खुशियाँ बेहिसाब थीं ,
उसी घर में आज हम इज़्ज़त नहीं पाते हैं .,
पापा का टूटा भरोसा और माँ की नम आँखें हैं,
लड़का-लड़की एक समान, सिर्फ बातें हैं ... !
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