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यादों के सहारे।

वो अब वहाँ है जहाँ रास्ते नहीं जाते
मैं जिसके साथ पिछले साल आया था।
सुना है उसके नाम पर भी छपने लगे किताबें बहुत
जिन्हें छोड़ कर अकेले जंगलों में आया था।
मुद्दतों बित गए कोई हाथ मेरे लबों पर आए हुए
रूखसत-ए-यार में कमबख्त होंठ नहीं कंपकंपाया था।
तमाम उम्र मेरा दम इस धुएं में घुंटा
वो एक चिराग था मैने उसे बुझाया था।
किसको होती है महबूब से दो गज जमीं नसीब
अनुराग देखकर तुझे शायद इसीलिए मुस्कुराया था।
©anuragrahi