सरलता की प्रबलता..
चित्त की सबलता..
इरादों में प्रसन्न्ता..
परिस्थिति में सामंजस्यता..
कर्म में तन्मयता..
शब्दों में नम्रता..
नैनो में मृदुता..
समर्पण में बाल्यता..
जब अंतर्मन है साधता..
उसके रोम रोम से बिखरती है,
ईश्वर की आराध्यता..
और अश्रु से छलकती है,
संसारिक वैराग्यता..
विलक्षण एकत्वता,
में स्थित होती है दृश्यता!!
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