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ये इश्क़ बेदार कब हैं ।

ये इश्क़ बेदार कब हैं
एक जुनूँ है फकत मगर बेकार कब हैं ।
राह चलते ऐसे वैसों को हो जाती है इश्क
ये इश्क इतना मिलनसार कब है ।
जब तलक न आए माशूक़ के चेहरे पर शिकन
कैसे समझे वो दिल मयार कब हैं ।
अब कुछ इश्क़ के बदल गए हैं मायने
पहले जैसा ये इश्क़ अब खुद्दार कब हैं ।
सुबह हुई निकाह और शाम को मिली तलाक
ये इश्क नहीं,इश्क़ इतना बेजार कब हैं।
अनुराग इश्क़ दिलबरों से अक्लमंदो के पाले है आ पड़ी
नहीं तो ये इश्क़, इश्क़ में ऐसे लाचार कब हैं ।
©anuragrahi