S

ये जो खत मेरे सिरहाने पड़े हैं ।

ये जो खत मेरे सिरहाने पड़े हैं
गर्द से जमी बहुत पुराने पड़े हैं ।
उन्हे देने की मुझमें हिम्मत न हुई
खून-ए-जीगर से लिखे-सने पड़े हैं ।
उसके लिए तो मैं फकत अतीत हूं
पुछे इस दिल में कितने सपने सुहाने पड़े हैं।
हर पल हर दिन बिते लम्हों की
यादों से बने अफसाने पड़े हैं।
इस दिल को रहा अब तक ये मलाल
हूई नहीं मेरी जिसके लिए खूं बहाने पड़े हैं।
अब ये तलब हुस्न परस्ती की भी न रहीं
खत के ही कई लफ्जों को मुझे मिटाने पड़े हैं।
©anuragrahi