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ये क्या कि एक ही तौर से गुजार दूं तमाम उम्र।

ये क्या कि एक ही तौर से गुजार दूं तमाम उम्र।

ग़मों से धुली रेत पर जिंदगी का हवा भी हो

लाख ज़ख़्म हो जिस्म पर दिल वहां रवां भी हो

आजकल तो आइना बहुत देखतें है आप

बा-खुदा आईने जैसा आप दिल जवां भी हो

गर खिज़ा है आ गई तो बसंत बहार अब दूर नहीं

बाग में है नाज़ुक क्लीं निहारने को बागबां भी हो

पुरी रात ख्वाब देखने का सिलसिला थमा नहीं

हर ख्वाब में बस तुम हो कभी कोई चेहरा नया भी हो

ये क्या कि एक ही तौर से गुजार दूं तमाम उम्र

अनुराग तेरे यादों का कुछ तो यहां निशां भी हो।