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ये सर्दियां यूँ ही बीत जाती.......

ये सर्दियां यूँ ही बीत जाती
गर तेरी स्मृतियां न आतीं
पवन की मद्धिम शीतलता
और निशा की सजलता
दो हृदय के मध्य अंतर
और तारों का स्वयंवर
एक कर में संदेशवाहक दूसरे में लेखनी है
मन में कुछ उठती शंकाये
इधर बतानी हैं या उधर लिखनी हैं
इसी में रजनी थी कटती
मैं भी अपने तर्क पर अड़ा रहता
तुम भी थी कि पीछे न हटती
रात यूँ ही बीत जाती
सारी गुत्थियाँ यूँ ही रीत जाती
भोर होने से ही पहले
भोर का संदेश मिलता
एक अदना यंत्र मेरा
कितने आत्म धागे सिलता
और अब है की समय पहिया
अपनी गति से तीव्र होकर
कितनी आशाएं कुचल कर
मुझसे आगे हो चला है
और अब अंधेरी रातें
दीवारों को तकती आँखे
अंतर्मन के भेद सूने
शयाद इन्ही का फैसला है
फिर भी एक छोटा सा तिनका
आंखों में गहरा जल है भरता
फिर वही उर मांगता है
जिनसे था ये हृदय भरता
फिर से है एक चाह जागी उर में
एक अल्हड़ हंसी पाने के लिए
भीड़ में फिर सबको हसाना चाहता है
तेरे केशों को उंगलियों के सहारे
उनमे वर्षों की जो उलझन पड़ी है
तेरे माथे में पड़ी गहरी सिकन
आंखों के किनारो पर सूखे सहारे
सब कुछ फिर सुलझना चाहता हूँ
फिर पुराने अनगड़े कुछ तथ्य लेकर
इन अधेरों में तुमसे उलझना चाहता हूँ
ये सर्दियां यूँ ही बीत जाती.......
-अमन वर्मा "अमन"
©amnakku