आज भी ना संभला तू,
ये वक़्त भी निकल गया।
जिस वक्त की तलाश थी,
वो वक़्त भी निकल गया।
टालता था तब भी तू,
टालता है अब भी तू।
क्यों कुछ नहीं बदल सका,
ये वक़्त तो निकल गया।
है किस घड़ी का इंतज़ार,
क्यों ना जागता है तू।
शुभ मुहूर्त की आस में,
ये वक़्त भी निकल गया।
रेत की तरह जो वक़्त
मुट्ठी से फ़िसल गया,
उस काल को ना याद कर,
वो वक़्त तो निकल गया।
ना मूर्खों-सा ख़्वाब पाल,
कि शुभ बेला आएगा।
आकर वो वक़्त रोज,
वक़्त पे निकल गया।
यही सही समय है 'दीप',
उठा ले अपने शस्त्र तू।
कल फ़िर ना पछताना पड़े,
ये वक़्त भी निकल गया।
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