यह जिंदगी मुझे क्यूँ अब आबाद चाहिए
जब अपनों को ही मेरी हालत बर्बाद चाहिए।
मेरी नाकामीयों ने है मुझे ये बात बताई
रिश्तों को भी अब आदमी कामयाब चाहिए।
क्या कसूर है पैरों तले कुचलते उन चिंटीयों का
शहर में खुद का उनका भी घर जनाब चाहिए।
आपने जिते-जी ही बड़े-बड़े है मुकाम हासिल किए
मुझे मरने के बाद ही कोई खिताब चाहिए।
वक्त ने बदल दी है आंखों के अब्र का मतलब
मुझे उनसे बस दो-चार सवालातों का जवाब चाहिए।
©anuragrahi
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