यहां कई दिन गुजारें कई रात की
दिखीं नहीं वो परी ख्यालात की।
बस सपनों में ही वो आती रही
शरमाते शरमाते मुझसे बात की।
कुछ पल के लिए ठहर जाता वो मंजर
खुशियों की उसने जो बरसात की।
आज़ मुकम्मल हुई सफ़र-ए-जिंदगी
इक आरज़ू जो थी मुलाकात की।
आइना से तो आज मैंने पुछ ही लिया
क्या कद्र है तुझे मेरे जज़्बात की।
उम्र ही अभी क्या जो बुढा दिखाते हो तुम
जबाव दो अनुराग के इस सवालात की।
©anuragrahi
S