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यहाँ मानव कितना अभिलाषी है ।

यहाँ मानव कितना अभिलाषी है
लोभ लालच अंतर मन की प्रवासी है।
बैठे हैं ये घर बसाए पल पल मन को उकसाए
धन जुटाना ही केवल अब शाबासी है
यहां मानव कितना अभिलाषी है ।
रीति रिवाज छोड़ उस सम्राज्य की चीत धरे
चकाचौंध जहाँ वहां कहाँ उदासी है
यहाँ मानव कितना अभिलाषी है ।
पैसों ने है प्रीत जगाया अजनबियों को मीत बनाया
मानव अब के बहुत आभासी है
यहाँ मानव कितना अभिलाषी है ।
मैं किसको अब प्रण बताऊं हालत अपनी मैं समझाउं
रिश्ते-नाते यहां सब सियासी है
यहाँ मानव कितना अभिलाषी है ।
©anuragrahi