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" योग "

योग मन का भाव है....
जिसके अनुभव में आनंद की छांव है...
जिस में समाहित ईश्वरीय विचार हैं....
यही मन की उन्नति का द्वार है....
यह भीतर की स्वच्छता का समग्र सार है...
इससे ही बाह्य तथा आंतरिक बल का संचार है....
इसमें स्वयं के स्वरूप की बहार है....
इसी से व्यक्ति का ईश्वर में एकाकार है....
यह पवित्रता का निर्मल व्यवहार है....
यह शरीर से मन की डोर का जुड़ाव है....
यह निष्ठा सरलता और धैर्य का संसार है....
यही सांसारिक व्याधि का उपचार है....
इसी से जीवन का वास्तविक उद्धार है.....
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