फिराक़ में तेरी, बे आराम से लगते हैं
ज़हनसीब हो तुम, तेरे साथ तो हम भी बे लॉस से लगते हैं।
ओ सावरिया,
क्या इल्म भी है तुझे,
पिंहाँ शफ़क़त का मेरे, तुम तो हमें,
हम - नफ़स से लगते हो।
तसव्वुर के इस खुल्द में,
हबाब से हो तुम ,तभी तो हम
आब से लगते हैं.....
©deeprichu
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