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corona का sting operation

कहने को यह महामारी हैऔर विपदा भी बड़ी भारी है।
जीवित रहने को भी संघर्ष चल रहा, ऐसी यह बीमारी है।।
कहीं आना जाना रुक गया, सेर सपाटा रूक गया।
जीवन बेचारा सा होकर घर के कोने मे दुबक गया।।
यारी, दोस्ती, रिश्तेदारी सब पर ये भरी पड़ गया।
अपने जब जीवन खो रहे, कोई दो आंसू बहाने ना गया।
याद आते होंगे ना वो दिन, जब देर रात तक घर आते थे तुम।
और जब बिना बताये स्कूल से गायब हो जाते थे तुम।।
जब तुम गर्मियों की छुट्टियों मे घूमने जाया करते थे।सालभर की सारी बोरियत और थकान वहीं छोड़कर आया करते थे।।
वो बड़ी -बड़ी शादिया, पार्टियां और सारे तीज त्यौहार।
वो रात रात भर नाचना -गाना -खाना और खुशियों की बौछार।।
सब कुछ कितना अच्छा था, याद तो आता है वो सब।
परन्तु सिक्के का दूसरा पहलू भी दिख जाता है तब।।
सोचो ना, क्या इस से पहले कभी मम्मी से इतनी बातें की थी?
क्या बता सकोगे कब उनके साथ बैठकर रामायण और महाभारत देखी थी?
क्या इतने प्रकार के पकवान पहले भी बना लेते थे तुम?
क्या दादू के साथ छत पर पतंग उड़ाने जाते थे तुम?
क्या पहले भी इतने सुकून से दादी के साथ बैठकर भोजन कर पाते थे?
या भागते -भागते कुछ निवाले ठूंसकर ऐसे ही निकल जाते थे?
क्या इस से पहले तुमने घर पर सब्जियाँ उगाने का सोचा?
क्या दादी संग मिलकर मठरी बनायीं, या घर को मारा था पोछा?
दिनभर दौड़ती थी सडक पर गाड़ियां और गगन मे धुंआ।
क्या कभी हम रुके कहीं, या आसमान इतना साफ हुआ?
कितना बर्बाद धन और भोजन को व्यर्थ दिखावे पर किया।
बचत का अर्थ इस महामारी ने हम सबको सीखा दिया।।
जानती हुँ इस महामारी ने बहुत कुछ हमसे छीना है।
किसी के अपने और किसी के सपने को छीना है।।
पर जीने का तरीका और सलीका भी तो सीखा दिया।
सब लेने की चाह रख रहे इंसान को देना भी तो सीखा दिया।।
जीवन की अंधी दौड़ मे दौड़ते -दौड़ते पशु से हो गए थे हम।
पर इस विपदा के कारण फिर से इंसान बन रहे है हम।।
प्रार्थना स्वीकार करें ऐ प्रभु!इस विपत्ति से जल्दी मुक्ति दो।
पर जो इंसानियत सिखाई है उसे बनाए रखने की शक्ति दो।।
✍️शिवन्या
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