K

आगे बढ़ पथिक

मैं सोचता हूं ना जीत की ना हार की, चीरने को तैयार मै धार को मझधार में।
हूकार भर और कल बदल,बदल सकता है तो खुद को बदल।
प्रज्वलित है ये लौ अटल, होगी अवश्य तपस्या सफल।
रोश नहीं ये आक्रोश है हृदय में बढ रहा जोश है,
हो अडिग तो बढ़ पथिक बढ सकता है तो बढ पथिक।
कर्म की तू समशिर है धेर्य तेरा शौर्य है,
जब समय आयेगा संसार तेरा गुण गाएगा।।
हो सके तो बढ पथिक बढ़ सके तो बढ़ पथिक
©kupoo