व्यापार में किसान और व्यापारी संबंध कितना अजीब है
तुम जानते हो फिर कर्ज़ व्यापारी का किसानों पर क्यों है
अजीब लगता जब किसान मेहनत करता सालभर खेत में
फिर भी व्यापारी मूल ब्याज वसूलता साल भर किसानों से
व्यापारी समझता व्यापार की अपनी अलग ही भाषा क्यों
मगर किसान की अपनी जीवन गाथा लिख चुका विधाता
जीतोड़ मेहनत अंतिम समय प्रकृति की मारसे बचना सका
पता नहीं क्यों प्रकृति भी उस पर मेहरबान नहीं जानते हो
आज पड़ी देश में महामारी है और किसान के घर में फिर
क्यों इतनी लाचारी है उसका फसल खेत में लहरा आ रहे
पसीने से लथपथ काया उसकी चमकती सूर्य रोशनी में
मगर आज उसके आंगन की खुशियां उदास क्यों है फिर
फसल का मूल्य सरकार ने निर्धारित कर दिया जानते हो
मगर व्यापारी का मूल सरकार ने निर्धारित ना कर सका
जो किसान गेहूं चावल ज्वार मक्का दाल मसाले खाद्य तेल
किसान उत्पादन करें और व्यापारी उसका दर से भुगतान
हक नहीं किसान का अपनी वस्तु का मूल्य निर्धारण करें
महाजन से उधार लिया भुगतान में जमीनें चली गई क्यों
अनपढ़ सा मजदूर किसान लाचारी उसकी बीमारी क्यों
सब कुछ किसानों ने दिया मगर मूल्य फिर भी नहीं मिला
सोचते हो क्यों सिर्फ 1 वोट की मूल्य तेरी व्यापारी से कम
किसान तो आसमा को ताक सरकार व्यापारी की हो गई
हृदय का तो सम्राट सिर्फ किसान ही होगा देश का सब किसानों हजारों दिलों की दुआएं मिलेंगी इस महामारी में
©lawnishtha
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